पोलिटी अनुसूच 03

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यहां पर पूरा मामला भारत के संविधान के पहले संशोधन (1951) के तहत विधायिका और न्यायपालिका के बीच विवाद का है। यह विवाद आर्थिक न्याय (Economic Justice) और मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के टकराव का उदाहरण है।

पृष्ठभूमि:

मुद्दा: भूमि सुधार कानूनों के जरिए सरकार ने भूमि की सीमा तय कर दी, जो संपत्ति का अधिकार (Property Right) था और मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता था।

चुनौती: जमींदारों ने न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) का सहारा लिया, यह तर्क देते हुए कि सरकार का यह कानून मौलिक अधिकारों (आर्टिकल 14 और 19) का उल्लंघन करता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने भूमि सुधार कानून को असंवैधानिक ठहराया, यह कहते हुए कि यह संविधान के अनुच्छेद 13 का उल्लंघन करता है, जो मौलिक अधिकारों के संरक्षण की गारंटी देता है।


सरकार की प्रतिक्रिया:

संविधान संशोधन: सरकार ने 1951 में संविधान का पहला संशोधन किया, जिसमें दो नए अनुच्छेद जोड़े गए—31A और 31B।

1. अनुच्छेद 31A:

यह प्रावधान करता है कि अगर राज्य भूमि सुधार कानून बनाता है, तो उसे आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार) और 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) के उल्लंघन के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

उद्देश्य: भूमि सुधार से संबंधित कानूनों को न्यायिक हस्तक्षेप से बचाना।



2. अनुच्छेद 31B:

अनुसूची 9 (नौवीं अनुसूची) बनाई गई, जिसमें डाले गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से बाहर कर दिया गया।

इसका अर्थ है कि अगर सरकार किसी कानून को नौवीं अनुसूची में डाल देती है, तो वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के बावजूद न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।





निष्कर्ष:

यह संशोधन सरकार को भूमि सुधार और आर्थिक न्याय जैसे सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करता है।

साथ ही, न्यायपालिका की शक्ति को सीमित करते हुए सरकार को व्यापक अधिकार देता है, खासकर जब कानून नौवीं अनुसूची में डाले जाते हैं।

यह विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन का प्रारंभिक उदाहरण था, जो आज भी संवैधानिक बहस का विषय है।


यदि इस विषय पर और अधिक विवरण या स्पष्टीकरण चाहिए, तो बताएं।


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यहां संविधान संशोधन और उसके प्रभावों को व्यवस्थित रूप से समझाया गया है। इस कहानी के सभी तत्वों को निम्नलिखित बिंदुओं में व्यवस्थित किया जा सकता है:

1. संविधान का पहला संशोधन (1951)

कारण: भूमि सुधार कानूनों के तहत जमींदारी उन्मूलन।

मुख्य बिंदु:

अनुच्छेद 31ए और 31बी जोड़े गए।

नौवीं अनुसूची में कानूनों को शामिल किया गया ताकि उन्हें न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके।


न्यायिक समीक्षा: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14 और 19) के उल्लंघन के बावजूद कानून वैध रहेगा।

प्रभाव: न्यायिक समीक्षा की शक्ति सीमित।


2. शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)

मुद्दा: पहले संशोधन की वैधता को चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

अनुच्छेद 368 एक "विशेष विधि" है।

अनुच्छेद 13 के तहत नहीं आता।

इसलिए मौलिक अधिकारों को सीमित या संशोधित किया जा सकता है।



3. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)

निर्णय:

शंकर प्रसाद के फैसले को बरकरार रखा।

अनुच्छेद 368 को "विशेष विधि" मानते हुए कहा कि यह मौलिक अधिकारों को संशोधित कर सकता है।



4. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)

निर्णय:

अनुच्छेद 368 को "विशेष विधि" मानने का निर्णय पलट दिया।

अनुच्छेद 368 भी अनुच्छेद 13 की परिधि में आता है।

इसलिए मौलिक अधिकारों को संशोधित नहीं किया जा सकता।


भविष्य लक्ष प्रभाव:

यह निर्णय केवल भविष्य के लिए लागू होगा।

पूर्व के कानूनों को वैध माना गया।



5. 24वां संविधान संशोधन (1971)

इंदिरा गांधी का कदम:

अनुच्छेद 13(4) और अनुच्छेद 368(3) जोड़े गए।

उद्देश्य: सुप्रीम कोर्ट के गोलकनाथ फैसले को पलटना।

मुख्य प्रावधान:

अनुच्छेद 13 की कोई बात अनुच्छेद 368 पर लागू नहीं होगी।

संसद को मौलिक अधिकार संशोधित करने का अधिकार दिया गया।




6. 25वां संविधान संशोधन (1971)

मुख्य बिंदु:

अनुच्छेद 31सी जोड़ा गया।

प्रावधान:

यदि सरकार अनुच्छेद 39(b) (संसाधनों का समान वितरण) और 39(c) (धन के केंद्रीकरण का निषेध) को लागू करने के लिए कानून बनाती है, तो उस कानून को अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।



उद्देश्य: डीपीएसपी को मौलिक अधिकारों से ऊपर रखना।

प्रभाव: समाजवादी नीतियों को बढ़ावा।


7. संविधान संशोधन और समाजवाद

इंदिरा गांधी के शासनकाल में संशोधनों ने डीपीएसपी को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी।

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सत्ता संघर्ष स्पष्ट हुआ।

संसाधनों का समान वितरण और समाजवाद को बढ़ावा दिया गया।


समग्र प्रभाव:

इन संशोधनों ने भारतीय संविधान की संरचना, न्यायिक समीक्षा की शक्ति और मौलिक अधिकारों की प्रकृति पर गहरा प्रभाव डाला। इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन करके अपने समाजवादी दृष्टिकोण को लागू करने का प्रयास किया।


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यह विवरण भारतीय संविधान और उससे संबंधित महत्वपूर्ण घटनाओं का व्याख्यान है, जो समाजवाद, उदारवाद, और संविधान संशोधन की प्रक्रिया के आसपास केंद्रित है। इसे चरणबद्ध तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है:

1. समाजवाद और 1991 के बाद का बदलाव

समाजवाद: 1991 से पहले भारत समाजवादी नीतियों पर आधारित था। निजी संपत्ति और पूंजीपतियों की सीमित संख्या थी।

1991 के बाद: उदारीकरण और निजीकरण की शुरुआत हुई। बड़े उद्योगपति जैसे अडानी और अंबानी का उदय हुआ, जो पूंजीवादी नीतियों की देन हैं।


2. समाजवाद के दौर में इंदिरा गांधी के कदम

14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969): प्राइवेट बैंकों को सरकारी नियंत्रण में लाया गया।

26वां संविधान संशोधन (1971): रजवाड़ों को दी जाने वाली पेंशन खत्म कर दी गई।

पाकिस्तान विभाजन और बांग्लादेश निर्माण (1971): इसमें सोवियत संघ (USSR) की मदद मिली। यह समाजवाद और भारत-रूस मित्रता का प्रभाव था।


3. भूमि सुधार कानून और केशवानंद भारती केस

भूमि सुधार कानून (1970): केरल सरकार ने भूमि पर सीमा निर्धारित की और धार्मिक संपत्तियों को भी गरीबों में बांटने का प्रयास किया।

केशवानंद भारती केस (1973): इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा चला। यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर बना।


4. संविधान संशोधन और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

इंदिरा गांधी सरकार ने कई संविधान संशोधन किए, जिनमें 24वां और 25वां संशोधन प्रमुख हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इन संशोधनों को चुनौती दी। सरकार और न्यायपालिका के बीच यह संघर्ष चला कि मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है या नहीं।


5. मूल ढांचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के "मूल ढांचे" को बदला नहीं जा सकता।

मूल ढांचे में शामिल हैं:

लोकतंत्र

मौलिक अधिकार

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

संघीय ढांचा आदि।


सरकार को यह स्पष्ट कर दिया गया कि वह संशोधन कर सकती है, लेकिन मूल ढांचे को नहीं बदल सकती।


6. मूल ढांचे का रहस्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का मूल ढांचा क्या है, यह केवल न्यायपालिका तय करेगी।

इस सिद्धांत ने भारतीय न्यायपालिका को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया।


निष्कर्ष

यह पूरी कहानी भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को दर्शाती है।

केशवानंद भारती केस ने भारतीय संविधान के स्थायित्व और लचीलापन सुनिश्चित किया।



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आपने जो कहानी साझा की, वह भारतीय संविधान के संशोधनों, न्यायिक समीक्षाओं और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत पर आधारित है। इसका विवरण निम्नलिखित है:

पृष्ठभूमि:

भारतीय संविधान के निर्माण के बाद, इसे समय और परिस्थिति के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। हालांकि, कुछ मुद्दों पर विवाद खड़ा हुआ, जैसे कि मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSPs) के बीच प्राथमिकता, संसद की संविधान संशोधन शक्ति, और न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा की भूमिका।


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मुख्य घटनाएं:

1. 42वां संविधान संशोधन (1976):

यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुआ।

इस संशोधन ने अनुच्छेद 368 (क्लॉज 4 और 5) को जोड़ा, जिसमें संसद को पूरे संविधान को संशोधित करने की असीम शक्ति दी गई।

यह भी जोड़ा गया कि इन संशोधनों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) नहीं की जा सकती।

अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों पर DPSPs (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) को प्राथमिकता दी गई।





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2. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980):

यह मामला न्यायालय में पहुंचा, जिसमें 42वें संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

संविधान के "मूल ढांचे" (Basic Structure Doctrine) का उल्लंघन करने वाला कोई भी संशोधन असंवैधानिक है।

न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, इसे हटाया नहीं जा सकता।

मौलिक अधिकार और DPSPs के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है; किसी को दूसरे पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।






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3. वामन राव बनाम भारत संघ (1981):

इस केस में नवीं अनुसूची (1951 में जोड़ी गई) के कानूनों पर सवाल उठाया गया।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

24 अप्रैल 1973 (केशवानंद भारती केस) के पहले बनाए गए कानून, यदि नवीं अनुसूची में शामिल हैं, तो उनकी न्यायिक समीक्षा नहीं होगी।

24 अप्रैल 1973 के बाद बनाए गए कानूनों को नवीं अनुसूची में डालने पर उनकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।






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निष्कर्ष:

मौलिक अधिकार संशोधन योग्य हैं, लेकिन संशोधन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ नहीं हो सकता।

न्यायिक समीक्षा, मौलिक अधिकार और DPSPs के बीच संतुलन, और संविधान की संशोधन प्रक्रिया संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं।

वर्तमान में नवीं अनुसूची के कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं यदि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।



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"मूल ढांचे" की अवधारणा:

यह सिद्धांत भारतीय संविधान के संरचनात्मक और मूलभूत सिद्धांतों को सुरक्षित रखता है। इनमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा, और विधायिका, कार्यपालिका, व न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन शामिल हैं।

इस कहानी में संवैधानिक विवादों और न्यायपालिका के हस्तक्षेप को विस्तृत रूप से समझाया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान कैसे लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण प्रणाली को बनाए रखने का प्रयास करता है।



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