पोलिटी 03 अपडेटिड
भारतीय संविधान के संशोधन, न्यायिक समीक्षा और मूल ढांचे का सिद्धांत
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पृष्ठभूमि:
भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया, जिसमें समय और परिस्थितियों के अनुसार संशोधन की गुंजाइश रखी गई। परंतु मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (DPSPs) के बीच प्राथमिकता, संसद की संविधान संशोधन शक्ति, और न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा के अधिकार को लेकर कई विवाद खड़े हुए।
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मुख्य घटनाएं:
1. संविधान का पहला संशोधन (1951):
मुद्दा: भूमि सुधार कानूनों को न्यायपालिका ने अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन मानते हुए खारिज कर दिया।
सरकार की प्रतिक्रिया:
अनुच्छेद 31A: भूमि सुधार कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती से बचाने के लिए।
अनुच्छेद 31B: नौवीं अनुसूची बनाई गई, जिसमें शामिल कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिए गए।
2. शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ (1951):
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन का विशेष अधिकार देता है, और यह अनुच्छेद 13 के तहत मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध नहीं लगाता।
3. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967):
सुप्रीम कोर्ट ने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित कर दिया।
निर्णय: मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
4. 24वां और 25वां संविधान संशोधन (1971):
24वां संशोधन: संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन का अधिकार दिया गया।
25वां संशोधन: अनुच्छेद 31C जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 39(b) और 39(c) (संसाधनों का समान वितरण) को लागू करने वाले कानून को न्यायिक समीक्षा से छूट दी गई।
5. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973):
निर्णय: संविधान के "मूल ढांचे" को बदला नहीं जा सकता।
"मूल ढांचा" तय करने का अधिकार न्यायपालिका के पास सुरक्षित रहेगा।
6. 42वां संविधान संशोधन (1976):
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में संसद को असीमित संशोधन अधिकार दिया गया।
न्यायिक समीक्षा की शक्ति समाप्त करने का प्रयास किया गया।
7. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980):
निर्णय:
न्यायिक समीक्षा संविधान का मूल ढांचा है। इसे हटाया नहीं जा सकता।
मौलिक अधिकार और DPSPs के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
8. वामन राव बनाम भारत संघ (1981):
नवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को 24 अप्रैल 1973 (केशवानंद भारती केस) के बाद भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया गया।
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मूल ढांचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine):
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि संविधान के कुछ सिद्धांत "मूल ढांचे" का हिस्सा हैं, जिन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता। इनमें शामिल हैं:
1. लोकतंत्र
2. मौलिक अधिकार
3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
4. संघीय ढांचा
5. धर्मनिरपेक्षता
6. न्यायिक समीक्षा
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निष्कर्ष:
इन संशोधनों और फैसलों ने भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन स्थापित किया।
केशवानंद भारती केस भारतीय संविधान की स्थिरता और लचीलापन सुनिश्चित करने वाला मील का पत्थर है।
न्यायिक समीक्षा, मौलिक अधिकार, और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान के विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित करता है।
मूल ढांचे का सिद्धांत भारतीय संविधान को समय के साथ बदलने की अनुमति देता है, लेकिन इसकी बुनियादी संरचना और मूल्यों को सुरक्षित रखता है।