04 पॉलिटी

राज्य और राष्ट्र: गांधीवाद और मार्क्सवाद

परिचय

गांधी और मार्क्स दोनों ही राज्यविहीन समाज (Stateless Society) की बात करते हैं। इन दोनों के बीच राज्यविहीन समाज के विचार पर एक समान सहमति पाई जाती है।

गांधीवाद

  • गांधी को दार्शनिक अराजकतावादी (Philosophical Anarchist) कहा जाता है।
  • उनके अनुसार, मानव के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए राज्य जैसी किसी संस्था की आवश्यकता नहीं है।
  • गांधी मानते हैं कि मानव स्वयं तार्किक, विवेकशील और अपना अच्छा-बुरा जानने में सक्षम है।

मार्क्सवाद

  • मार्क्स राज्य को एक पूंजीवादी संस्था मानते हैं।
  • उनके अनुसार, राज्य समाज में गरीब और मजदूरों (बहुसंख्यक) का शोषण करता है।
  • राज्य केवल पूंजीपतियों के हितों की पूर्ति करता है।
  • मार्क्स वर्ग संघर्ष (Class Struggle) और निजी संपत्ति की समाप्ति पर बल देते हैं।

अराजकतावादी की परिभाषा

जो व्यक्ति राज्य या सरकार में विश्वास नहीं करता है, उसे अराजकतावादी (Anarchist) कहा जाता है।

अराजकतावादी की अवधारणा:

  • अराजकता (Anarchy) का मतलब है ऐसी स्थिति जहां राज्य, सरकार, कानून, और विधि व्यवस्था मौजूद न हो।

निष्कर्ष

गांधी और मार्क्स दोनों ही राज्यविहीन समाज की बात करते हैं। गांधी इसे मानव के विवेकशील होने से जोड़ते हैं, जबकि मार्क्स इसे वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद के शोषण से जोड़ते हैं।

तैयारी के लिए गंभीर अध्ययन और विश्लेषण करें।

Part 01

गांधीवाद और मार्क्सवाद पर नोट्स

गांधीवाद और मार्क्सवाद के बीच समानताएं

गांधीवाद और मार्क्सवाद दोनों विचारधाराएं अपने अंतिम लक्ष्य के रूप में राज्यविहीन समाज की स्थापना का समर्थन करती हैं। हालांकि, इनके दृष्टिकोण और तरीकों में भिन्नता है:

  • गांधीजी सत्य और अहिंसा पर बल देते हैं।
  • मार्क्स वर्ग संघर्ष और निजी संपत्ति की समाप्ति पर जोर देते हैं।

अराजकता की परिभाषा

जब राज्य सरकार, पुलिस, सेना, और विधि कानून का अभाव होता है, तो ऐसी स्थिति को अराजकता (अनार्की) कहा जाता है। इसे हम अन्य शब्दों में जंगल राज भी कह सकते हैं।

जंगल राज का उदाहरण

जंगल में कोई कानून या नियम नहीं होता। वहां "जिसकी लाठी उसकी भैंस" का नियम चलता है। उदाहरण:

  • शेर किसी हिरण का शिकार करता है, और वह हिरण अपनी मृत्यु तक स्वतंत्र नहीं रह सकता।
  • हिरण का जीवन तब तक सुरक्षित होता है जब तक शेर की नजर उस पर नहीं पड़ती।

राज्य सरकार का महत्व

राज्य सरकार, पुलिस और सेना का उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षा और स्वतंत्रता प्रदान करना है। इनके बिना:

  • जीवन में असुरक्षा और अराजकता बढ़ जाएगी।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होगा।
  • भयावह परिस्थितियों का जन्म होगा, जैसा कि जंगल में होता है।

क्या पुलिस और सेना स्वतंत्रता को बाधित करती हैं?

यह सोचना कि पुलिस और सेना हमारी स्वतंत्रता को बाधित करती हैं, एक गलत धारणा है। वे हमारी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करती हैं। उदाहरण:

  • रात में पुलिस आपकी सुरक्षा के लिए आपकी गतिविधियों की जांच करती है।
  • ट्रैफिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ट्रैफिक पुलिस का कार्य।

निष्कर्ष

अगर राज्य सरकार, पुलिस और सेना नहीं होंगी, तो समाज में अराजकता का माहौल बनेगा। ऐसे में व्यक्ति स्वतंत्र महसूस कर सकता है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता अस्थायी होगी और वह खतरे में रहेगा। इसलिए, एक संगठित और नियमबद्ध समाज के लिए सरकार और कानून का होना अत्यंत आवश्यक है।

Part 03

राज्य, विधि और स्वतंत्रता पर नोट्स

राज्य का महत्व

राज्य का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता और जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यदि राज्य नहीं है, तो समाज में अराजकता फैल सकती है, जिससे भय और असुरक्षा का वातावरण बनेगा। राज्य विधि और कानून के माध्यम से नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है।

विधि और स्वतंत्रता का संबंध

विधि और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि विधि नहीं होगी, तो स्वतंत्रता भी नहीं होगी। स्वतंत्रता तभी संभव है जब समाज में एक व्यवस्थित कानून व्यवस्था हो।

उदाहरण:

  • यदि ट्रैफिक लाइट या ट्रैफिक पुलिस नहीं हो, तो यातायात में अराजकता फैलेगी और हर कोई जल्दी निकलने की कोशिश करेगा, लेकिन कोई सफल नहीं होगा।
  • राज्य नागरिकों की जान और संपत्ति की सुरक्षा करता है। यदि राज्य नहीं होगा, तो जीवन पर निरंतर खतरा रहेगा।

राज्य, विधि और स्वतंत्रता के सिद्धांत

  • यदि विधि है, तो स्वतंत्रता है।
  • यदि विधि नहीं है, तो स्वतंत्रता भी नहीं है।
  • राज्य का मुख्य उद्देश्य जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा करना है।
  • विधि की अनुपस्थिति में समाज में अराजकता उत्पन्न होती है।

महत्वपूर्ण कथन:

"यदि विधि नहीं है, तो स्वतंत्रता भी नहीं है।"

यह कथन यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए एक व्यवस्थित कानून व्यवस्था का होना आवश्यक है।

विधि और स्वाधीनता के बीच संबंध

प्रश्न:

विधि और स्वाधीनता के बीच सबसे उपयुक्त संबंध को निम्नलिखित में से कौन प्रतिबिंबित करता है?

  1. यदि विधियां अधिक होती हैं, तो स्वाधीनता कम होती है।
  2. यदि विधि नहीं है, तो स्वाधीनता भी नहीं है।
  3. यदि स्वाधीनता है, तो विधि निर्माण जनता को करना होगा।
  4. यदि विधि परिवर्तन बार-बार होता है, तो स्वाधीनता बाधित होती है।

उत्तर:

"यदि विधि नहीं है, तो स्वाधीनता भी नहीं है।"

निष्कर्ष:

राज्य, विधि और स्वतंत्रता एक-दूसरे से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। राज्य नागरिकों की स्वतंत्रता और जीवन की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। विधि के बिना समाज में अराजकता होगी, जिससे स्वतंत्रता संभव नहीं हो पाएगी।

क्लास नोट्स

राज्य और स्वाधीनता

"यदि विधि नहीं है तो स्वाधीनता भी नहीं है।" - विधि और स्वाधीनता एक-दूसरे के पूरक हैं।

राज्य का मुख्य उद्देश्य है व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता को बनाए रखना। राज्य के बिना जीवन असुरक्षित है और अराजकता का वातावरण बन सकता है।

राज्य की आवश्यकता

  • राज्य जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • राज्य विहीन समाज में अराजकता होती है।
  • अराजकता को धर्मशास्त्र में "मत्स्य न्याय" कहा गया है।
  • मत्स्य न्याय: बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है (माइट इज राइट)।

राज्य का विकास

राज्य हमेशा से रहा है, परंतु इसके स्वरूप में समय के साथ परिवर्तन हुआ है।

  • प्राचीन राज्य: राजतंत्र के रूप में।
  • आधुनिक राज्य: लोकतंत्र के रूप में।
  • आज का लोकतंत्र कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित है।

आधुनिक युग की शुरुआत

आधुनिक युग की शुरुआत 15वीं-16वीं शताब्दी में हुई।

  • वैज्ञानिक क्रांति ने धर्म और आस्था के बोलबाले को चुनौती दी।
  • उदाहरण: ब्रूनो और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों ने तर्क और अनुभव के आधार पर नई धारणाएं प्रस्तुत की।
  • धर्म और आस्था में तर्क और अनुभव की कमी थी, जबकि विज्ञान ने तर्क और संदेह को प्राथमिकता दी।

स्वरूप का अर्थ

स्वरूप: किसी चीज़ की विशेषताओं का समग्र रूप।

  • उदाहरण: जनजातीय विद्रोह का स्वरूप
  • स्थानीय मुद्दे, स्थानीय नेता
  • चमत्कारों और आस्थाओं पर विश्वास
  • आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का अभाव

निष्कर्ष

राज्य का स्वरूप समय के साथ बदला है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य हमेशा जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना रहा है।

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